पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का महापर्व पितृपक्ष 19 सितंबर से भाद्रपक्ष पूर्णिमा से शुरू हो गया है। आश्विन कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक पितरों का श्राद्ध करने की परंपरा है।
पितृपक्ष अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने, उनका स्मरण करने और उनके प्रति श्रद्धा अभिव्यक्ति करने का महापर्व है। इस अवधि में पितृगण अपने परिजनों के समीप विविध रूपों में आते हैं और अपने मोक्ष की कामना करते हैं। परिजनों से संतुष्ट होने पर पूर्वज आशीर्वाद देते हैं. इससे हमारा भाग्य बढ़ता है हम अनिष्ट घटनाओं से भी बचते हैं।
जिस तिथि में माता-पिता का देहांत हुआ है, उसी तिथि में श्राद्ध करना चाहिए। ज्योतिष मान्यताओं के आधार पर सूर्यदेव जब कन्या राशि में गोचर करते हैं तब हमारे पितर अपने पुत्र-पौत्रों के यहां विचरण करते हैं। विशेष रूप से वे तर्पण की कामना करते हैं। श्राद्ध से पितृगण प्रसन्न होते हैं और श्राद्ध करने वालों को सुख-समृद्धि, सफलता, आरोग्य और संतानरूपी फल देते हैं।
पित्र दोष जन्म पत्री देखने से ज्ञात हो जाता है. पितृ पक्ष इस दोष से मुक्ति पाने, पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करने और उनके माध्यम से भाग्य जागृत करने हेतु सर्वोतम माना जाता है.