गुरू के प्रति श्रद्वा प्रकट करने के लिए शिष्यों द्वारा मनाये जाना वाला पर्व गुरू पूर्णिमा होता है। गुरू पूर्णिमा आषाढ मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। इस दिन शिष्य अपने गुरू की पूजा करते हैं और ज्ञान-मार्गदर्शन लेते हैं। इस पर्व को लेकर महत्वपूर्ण बातें इस प्रकार है।
- गुरू पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरंभ में आती है।
- इसके बाद आगामी चार महीने मौसम के हिसाब से अनुकूल रहते हैं।
- इस समय में शिष्यों को गुरू के चरणों में उपस्थित रह कर ज्ञान,शांति व भक्ति की प्राप्ति होती है।
- धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन महर्षि वेदव्यास जी का जन्म हुआ था। इसलिए इस दिन इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
- पूरे भारत में यह पर्व बडी श्रद्वा के साथ मनाया जाता है।
- यह पर्व गुरू के प्रति शिष्य की श्रद्वा को बताने वाला पर्व है।
- इस दिन शिष्य अपने गुरू के पास पहुंच कर उनकी पूजा करते हैं।
- वेदव्यास जी की भी इस दिन पूजा की जाती है।
- गुरू पूर्णिमा के दिन जल्दी उठ कर स्नान आदि से निवृत्त होकर साफ-सुथरे वस्त्र पहन कर श्रद्वा के साथ अपने गुरू की पूजा अर्चना करनी चाहिए।
- गुरू पूर्णिमा के दिन अपने ईष्ट देवों की भी पूजा करने का विशेष महत्व होता है।
- गुरू की पूजा पश्चात उन्हें दक्षिणा भी देनी चाहिए।
- गुरू के समक्ष बैठ कर उनका आशीर्वाद लेकर ज्ञान,मार्गदर्शन भी जरूर लेना चाहिए।
- अपने मन व जीवन की समस्याओं को उनके समक्ष रख कर उचित सलाह भी लेनी चाहिए।
- कहा जाता है कि गुरू अपने शिष्य को अंधकार रूपी अज्ञानता से निकाल कर प्रकाश रूपी ज्ञान की ओर ले जाते हैं।
- जीवन में हर व्यक्ति को अपना एक गुरू अवश्य बनाना चाहिए तभी जीवन का कल्याण हो सकता है।