हिन्दू धर्म में कलावा का बडा महत्व होता है और इसे मौलि व रक्षा सूत्र भी कहा गया है ।
पूजा-पाठ व शुभ अवसरों पर कलाई पर मौलि या कलावा बांधने की शुरू से परंपरा चली आ रही है ।
कलावा के धार्मिक के साथ वैज्ञानिक महत्व भी हैं। इस मामले में विस्तार से जान लें कि कलावा के क्या महत्व है ।
- धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अगर हाथ की कलाई में विधिपूर्वक कलावा बांधा जाता है
तो त्रिदेव अर्थात् ब्रह्मा,विष्णु व महेश की कृपा होती है और साथ में देवियों का आशीर्वाद भी मिलता है ।
- कलावा को रक्षासूत्र भी कहा जाता है और इसे पूजा पाठ व शुभ कार्यों पर पंडित से मंत्रोच्चार के साथ बंधवाया जाता है ।
- पुरूष व कुंवारी कन्याएं इसे दाहिने हाथ की कलाई में तो विवाहित स्त्री बांए हाथ की कलाई में बांधती है ।
- माना जाता है कि कलाई पर इसे बांधने से जीवन में आने वाले संकटों से रक्षा होती है ।
- शरीर की प्रमुख संरचना का नियंत्रण कलाई में होता है और कई प्रमुख अंगों तक जाने वाली नसें कलाई से होकर गुजरती है ।
- अगर कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा जाएगा तो नसों की क्रिया नियंत्रित रहेगी और वात,पित्त व कफ का सांमजस्य बना रहेगा ।
- इस तरह कलाई पर कलावा बांधने से गंभीर बीमारियों से रक्षा होगी और शरीर स्वस्थ रहेगा ।
- क्लावा बांधने का नियम है कि जब किसी से इसे कलाई पर बंधवाए तो जिस हाथ में बंधवा रहे उसकी मुठ्ठी बंद होनी चाहिए
और दूसरा हाथ सिर पर रखना चाहिए।
- त्यौहार व शुभ कार्य के अलावा मंगलवार व शनिवार के दिन कलावा बांधा जा सकता है ।
- कलावा दो तरह के होते हैं। इनमें एक 3 धागों वाला होता है तो दूसरा 5 धागों वाला होता है ।
- 3 धागों वाले में लाल,पीले व हरे होते है जिसे त्रिदेव का कलावा कहते हैं
तो 5 धागे वाले में लाल,पीला,हरा,नीला व सफेद रंग का धागा होता है जिसे पंचदेव कलावा कहते हैं ।
- पुरानी मान्यता है कि कलावा को 3 बार ही कलाई पर लपेटना चाहिए ।
- कलावा यानि रक्षा सूत्र को बांधने से मन शांत रहता है और अंदर हर पल एक शक्ति होने का अहसास बना रहता है ।
- एक धार्मिक मान्यता भी है सदियों पूर्व जब भगवान इंद्र वृत्तासुर से लडने के लिए जा रहे थे
तब उनकी पत्नी शचि ने इंद्र की भुजा पर यह रक्षा सूत्र के रूप में बांधा था
और भगवान इंद्र की यु़द्व में विजय भी हुई थी तब से यह परंपरा चली आ रही है।