पितरों के प्रति श्रद्वा अर्पित करने का भाव ही श्राद् कहलाता है।
हर साल श्राद् पक्ष में 15 दिन श्राद् के लिए माने गए है।
अगर इन दिनों में नियमानुसार श्राद् किए जाते है तो पितृ प्रसन्न व संतुष्ट रहते हैं
लेकिन अगर कोई गलती हो जाए तो फिर पितृ नाराज होकर शाप भी देते हैं।
इसलिए जान लेते हैं कि आखिर वह कौनसी जरूरी ध्यान करने वाली बातें,नियम है
जिन्हें श्राद् पक्ष में नहीं भूलना चाहिए।
- श्राद् के 15 दिनों में जल से तर्पण जरूर करना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि जल तर्पण से पितरों की प्यास बुझती है।
- कभी भी रात्रि के समय श्राद् नहीं करना चाहिए।
- श्राद् में मसूर,चना, काली उदड,लहसुन,प्याज आदि के उपयोग व सेवन से परहेज करना चाहिए।
- श्राद् पक्ष के दिनों में अगर कोई भिखारी,गरीब दरवाजे पर आए तो उसे खाली हाथ नहीं भेजना चाहिए।
- इन दिनों में मसाज या तेल नहीं लगाना चाहिए।
- इसके अलावा बाल,नाखून काटना या दाढी बनाना गलत होता है।
- श्राद् पक्षों में पत्नी के साथ संबंध भी बिल्कुल नहीं बनाने चाहिए।
- मांस,मदिरा का सेवन भी नहीं करना चाहिए।
- अगर इन दिनों में किसी कारणवश घर से बाहर है तो श्राद् किसी दूसरे व्यक्ति के घर पर नहीं करना चाहिए। इस दौरान किसी मंदिर या तीर्थ स्थल पर श्राद् कर सकते हैं।
- जिस दिन श्राद् हो उससे पहले ही संबंधित ब्राह्मण को घर पर खाने के लिए आमंत्रित कर देना चाहिए।
- श्राद् के दिन आदर-सत्कार के साथ ही ब्राह्मण को घर बुलाकर भोजन करवाएं।
- भोजन बनाने के दौरान काम में लिए जाने वाले खाद्य पदार्थ शुद्व,ताजा व स्वच्छ हो। खराब अन्न का उपयोग नहीं करना चाहिए।
- लोहे के आसन पर ब्राह्मण को नहीं बिठाएं।
- दोनों हाथों से ही भोजन परोसना चाहिए। मान्यता है कि एक साथ से भोजन परोसे जाने पर भोजन को राक्षस छीन लेते हैं।
- भोजन के बाद उचित दक्षिणा देकर आशीर्वाद जरूर लेना चाहिए।
- दक्षिणा देने व आशीर्वाद लेने के बाद ब्राह्मणों को दरवाजे तक जरूर छोडने जाएं,ऐसा माना जाता है कि इस तरह करने से पितरों की विदाई होती है।
- श्राद् पक्षों के दौरान दिन में नहीं सोना चाहिए।
- इन प्रमुख बातों का ध्यान रख कर ही श्राद् किए जाने चाहिए जिससे पितृ प्रसन्न व संतुष्ट रहे और आशीर्वाद दें जिससे सुख,शांति व तरक्की हो अन्यथा लापरवाही व कोई गलती होने से जीवन में परेशानी उठानी पड सकती है।